Sunday, August 21, 2011
Friday, July 1, 2011
जिसके पास नहीं हैं गाँधी वो सबसे बड़ा गद्दार है।
गाँव का प्रधान हो या इस देश का प्रधानमंत्री सभी ने इस देश को बर्बाद करने का सम्पूर्ण प्रयास किया हैं, इसका प्रमाण इस देश की जनता के पासहैं।
जिसके पास है जितना गाँधी वो उतना ही बड़ाईमानदार है,
जिसके पास नहीं हैं गाँधी वो सबसे बड़ा गद्दार है।
मत पूछो ये कैसी सरकार है,
जिन लोगो ने धर्म के नाम पर देश के दो टुकड़ेकिए आज भी उन्हीं की सरकार हैं,
इसलिए तो कहते हैं मेरा भारत महान है।
100 में 99 बंे बेईमान है जो भारत को बेचने केलिए आज भी तैयार है। नेता
जब तिजोरियो में कैद है आजादी के बाद भी गाँधी,
तो कैसे आयेगी इस देश में विकास की आधी।
गाँधी को गोडसे ने मारा तो उनको फाँसी दे दी गई,मगर जो गाँधी को रोज मार रहे है उनका क्याहोगा , भारत को गाँधी सुखी स्मृद्धि और आत्मनिर्भर बनाना चाहतें थे,इसलिए उन्होने स्वराज कानारा दिया लेकिन हमारेदेश के नेता भारत कोविदेश बनाना चाहतें है वो भी येसा देश जहा अपनाकुछ न हो ,सारा विदेश कम्पनीयों का हो औरहमारे देश के लोग विदेशी कम्पनियो के गुलाम हो, जिस तरह अंग्रेजों के होते थे , गाँधी के बतायेरास्तेपर हमारेदेश का कोई नेेता चले न चले,लेकिन सारे नेता गाँधी के लिए परेशान कुछ भीकरने को तैयार है । धर्म, जाति , भाषा ,प्रांत हरमुद्दे को भजाने के लिए बेकरार है, बडे़ दुख के साथआप से अनुरोध करता हूँ,कि स्विस बैंक में जमा1500 अरब डालर जो भारत की जनता को लूट करजमा किया गया है, उसको भारत जाए तथा उनदेश द्रोहियो को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए ,
जिसके पास है जितना गाँधी वो उतना ही बड़ाईमानदार है,
जिसके पास नहीं हैं गाँधी वो सबसे बड़ा गद्दार है।
मत पूछो ये कैसी सरकार है,
जिन लोगो ने धर्म के नाम पर देश के दो टुकड़ेकिए आज भी उन्हीं की सरकार हैं,
इसलिए तो कहते हैं मेरा भारत महान है।
100 में 99 बंे बेईमान है जो भारत को बेचने केलिए आज भी तैयार है। नेता
जब तिजोरियो में कैद है आजादी के बाद भी गाँधी,
तो कैसे आयेगी इस देश में विकास की आधी।
गाँधी को गोडसे ने मारा तो उनको फाँसी दे दी गई,मगर जो गाँधी को रोज मार रहे है उनका क्याहोगा , भारत को गाँधी सुखी स्मृद्धि और आत्मनिर्भर बनाना चाहतें थे,इसलिए उन्होने स्वराज कानारा दिया लेकिन हमारेदेश के नेता भारत कोविदेश बनाना चाहतें है वो भी येसा देश जहा अपनाकुछ न हो ,सारा विदेश कम्पनीयों का हो औरहमारे देश के लोग विदेशी कम्पनियो के गुलाम हो, जिस तरह अंग्रेजों के होते थे , गाँधी के बतायेरास्तेपर हमारेदेश का कोई नेेता चले न चले,लेकिन सारे नेता गाँधी के लिए परेशान कुछ भीकरने को तैयार है । धर्म, जाति , भाषा ,प्रांत हरमुद्दे को भजाने के लिए बेकरार है, बडे़ दुख के साथआप से अनुरोध करता हूँ,कि स्विस बैंक में जमा1500 अरब डालर जो भारत की जनता को लूट करजमा किया गया है, उसको भारत जाए तथा उनदेश द्रोहियो को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए ,
Friday, December 18, 2009
देशभर में एकसमान गन्ना मूल्य प्रणाली
देशभर में एकसमान गन्ना मूल्य प्रणाली के लिए फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) लागू करने के लिए विवादास्पद अध्यादेश के स्थान पर संशोधन के साथ लाया गया विधेयक संसद ने पारित कर दिया है। सरकार द्वारा गत 21 अक्टूबर को जारी अध्यादेश का देशभर के किसानों और अधिकांश राजनीतिक दलों द्वारा भारी विरोध करने के चलते संसद में नए प्रावधानों के साथ विधेयक पेश किया गया था। इस विधेयक के जरिए जहां एफआरपी से अधिक मूल्य लागू करने के राज्यों के अधिकार को बरकरार रखा गया है, वहीं उसके लिए राज्यों पर वित्तीय बोझ डालने के प्रावधान को भी समाप्त कर दिया गया है। बुधवार को राज्य सभा में पारित आवश्यक वस्तु (संशोधन एवं पुनस्र्थापन) विधेयक, 2009 को लोक सभा पहले ही पारित कर चुकी है।
मालूम हो कि एफआरपी की तमाम खामियों और इस पर विभिन्न वर्गे की आपत्तियों को सबसे पहले बिजनेस भास्कर ने ही अपने यहां एक सीरीज में काफी विस्तार के साथ पेश किया था। बाद में केंद्र सरकार को भारी दबाव के आगे झुकना पड़ा और उसने संबंधित विधेयक में संशोधन का निर्णय लिया। इस विधेयक से बनने वाले नए कानून के मुताबिक देश में लेवी चीनी के लिए गन्ने की एकसमान मूल्य व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) लागू हो गई है। चालू पेराई सीजन (2009-10) के लिए एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि पिछले साल गन्ने का वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) 107.76 रुपये प्रति क्विंटल था। सरकार ने गन्ना मूल्य को लेकर पहले जारी विवादास्पद अध्यादेश के स्थान पर यह विधेयक पेश किया था।
अध्यादेश जारी होने के बाद किसानों के जबर्दस्त विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने गन्ना मूल्य के लिए अध्यादेश और गन्ना नियंत्रण आदेश के प्रावधानों में बदलाव का फैसला किया था। सरकार द्वारा नई मूल्य प्रणाली उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) लागू कर दी गई है, इसलिए एसएमपी स्वत: समाप्त हो गया है। चालू सीजन से लेवी शुगर के दाम एफआरपी के आधार पर तय होंगे। उधर, इससे पहले की अवधि के लिए केवल एसएमपी ही आधार माना जाएगा।
नए कानून में राज्य सरकारों द्वारा घोषित किए जाने वाले राज्य परामर्श मूल्य और गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 में धारा पांच (ए) के तहत किसानों के साथ चीनी मिलों के मुनाफे में हिस्सेदारी के प्रावधानों को न्यूनतम मूल्य से अलग कर दिया गया है। इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा गया है कि न्यूनतम मूल्य में उक्त अतिरिक्त मूल्य शामिल नहीं है, इसलिए लेवी चीनी की कीमत के लिए गन्ने के मूल्य में केवल न्यूनतम वैधानिक मूल्य (एसएमपी) ही शामिल होगा।
कानून में नए प्रावधान के चलते सरकार ने राज्यों के एसएपी के अधिकार को बरकरार रखने की रणनीति अपनाई है। इसके साथ ही न्यूनतम मूल्य को स्पष्ट करते हुए सरकार पर चीनी मिलों द्वारा बताए जा रहे करीब 14,000 करोड़ रुपये के बकाये से छुटकारा पाने का प्रावधान भी हो गया है।
मालूम हो कि एफआरपी की तमाम खामियों और इस पर विभिन्न वर्गे की आपत्तियों को सबसे पहले बिजनेस भास्कर ने ही अपने यहां एक सीरीज में काफी विस्तार के साथ पेश किया था। बाद में केंद्र सरकार को भारी दबाव के आगे झुकना पड़ा और उसने संबंधित विधेयक में संशोधन का निर्णय लिया। इस विधेयक से बनने वाले नए कानून के मुताबिक देश में लेवी चीनी के लिए गन्ने की एकसमान मूल्य व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) लागू हो गई है। चालू पेराई सीजन (2009-10) के लिए एफआरपी 129.84 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि पिछले साल गन्ने का वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) 107.76 रुपये प्रति क्विंटल था। सरकार ने गन्ना मूल्य को लेकर पहले जारी विवादास्पद अध्यादेश के स्थान पर यह विधेयक पेश किया था।
अध्यादेश जारी होने के बाद किसानों के जबर्दस्त विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने गन्ना मूल्य के लिए अध्यादेश और गन्ना नियंत्रण आदेश के प्रावधानों में बदलाव का फैसला किया था। सरकार द्वारा नई मूल्य प्रणाली उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) लागू कर दी गई है, इसलिए एसएमपी स्वत: समाप्त हो गया है। चालू सीजन से लेवी शुगर के दाम एफआरपी के आधार पर तय होंगे। उधर, इससे पहले की अवधि के लिए केवल एसएमपी ही आधार माना जाएगा।
नए कानून में राज्य सरकारों द्वारा घोषित किए जाने वाले राज्य परामर्श मूल्य और गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 में धारा पांच (ए) के तहत किसानों के साथ चीनी मिलों के मुनाफे में हिस्सेदारी के प्रावधानों को न्यूनतम मूल्य से अलग कर दिया गया है। इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा गया है कि न्यूनतम मूल्य में उक्त अतिरिक्त मूल्य शामिल नहीं है, इसलिए लेवी चीनी की कीमत के लिए गन्ने के मूल्य में केवल न्यूनतम वैधानिक मूल्य (एसएमपी) ही शामिल होगा।
कानून में नए प्रावधान के चलते सरकार ने राज्यों के एसएपी के अधिकार को बरकरार रखने की रणनीति अपनाई है। इसके साथ ही न्यूनतम मूल्य को स्पष्ट करते हुए सरकार पर चीनी मिलों द्वारा बताए जा रहे करीब 14,000 करोड़ रुपये के बकाये से छुटकारा पाने का प्रावधान भी हो गया है।
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